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	<title>भारतीय सिक्के</title>
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	<pubDate>Mon, 27 Apr 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
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		<title>10 रुपये का सिक्का 100,000 रुपये में !!</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Apr 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[भारत गणतंत्र]]></category>

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		<description><![CDATA[ भारतीय सिक्के अकसर मिश्र धातुओं के बनते हैं, लेकिन सन 2005 में पहली बार द्विधातु के 10 रुपये के सिक्के जारी किये गये जिनको शायद ही किसी ने देखा हो!! जितने सिक्के जारी किये गये थे वे सब के सब सिक्का-प्रेमी लोगों ने सीधे सरकार से खरीद लिये थे, और बाद में सन 2005 [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/04/10rupee.jpg"><img title="10 Rupee" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="470" alt="10 Rupee" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/04/10rupee-thumb.jpg" width="233" align="left" border="0" /></a> भारतीय सिक्के अकसर मिश्र धातुओं के बनते हैं, लेकिन सन 2005 में पहली बार द्विधातु के 10 रुपये के सिक्के जारी किये गये जिनको शायद ही किसी ने देखा हो!! जितने सिक्के जारी किये गये थे वे सब के सब सिक्का-प्रेमी लोगों ने सीधे सरकार से खरीद लिये थे, और बाद में सन 2005 का द्विधातु का 10 रुपये का एक सिक्का 1 लाख रुपये तक में बिका था.</p>
<p>2005 का यह सिक्का इतना दुर्लभ है कि मैं ने अभी तक इसके दर्शन नहीं किये है. इसके बाद 2006 और 2007 में इसी तरह के द्विधातु के 10 रुपये के सिक्के जारी किये गये, लेकिन वे भी संग्रहकर्ताओं ने खरीद लिये और बाजार में नहीं उतर पाये. 2006 का एक सिक्का तब 5000 रुपये में बिकता था, लेकिन अब कीमत कुछ कम हो गई है. </p>
<p>बगल में 2006 का जो सिक्का दिख रहा है वह आजकल 500 रुपये का हो गया है. सन 2007 का सिक्का भी आजकल 500 रुपये का बिकता है. सरकार 2008 में पुन: इस तरह के सिक्के जारी करने जा रही है जिसे आप बगल में देख सकते हैं.</p>
<p>इस बार सरकार इन सिक्कों की संग्रहकर्ता-मांग से लगभग दुगने सिक्के जारी करने जा रही है और इस कारण ये महज 50 रुपये में बिक रहे हैं. लेकिन जरा सोचें कि सन 2008 का 10 रुपये का सिक्का यदि आज 50 रुपये में बिक रहा हो तो इस द्विधातुअ सिक्के का भविष्य कैसा होगा. </p>
<p> <span id="more-28"></span>
</p>
<p>मुझे फिलहाल 2006 और 2008 के ही सिक्के मिल पाये हैं, लेकिन मैं हर तरह से कोशिश कर रहा हूँ कि 2005 और 2007 के द्विधातु सिक्के किसी तरह अपनी जेब में छेद करवाये बिना पा सकूँ!!</p>
<p>यदि आप सिक्कों के शौकीन हैं तो एक बात नोट कर लें &#8212; भारतीय सिक्कों का संग्रह एक ज्ञानदायक शौक है जिसमें निवेश की गई राशि कभी नहीं डूबेगी. (हां, एक आधुनिक सिक्के को 100,000 रुपये में खरीदेंगे तो यकीन मानिये कि आप डूब चुके हैं). आज ही जरा अपनी पेटीपोटली आदि टटोल कर 1 पैसे से लेकर 20 पैसे तक के जितने सिक्के मिल जाते हैं उनको कहीं सुरक्षित रख लें. ये आज बेकार हैं, लेकिन कल इन से आपके बच्चों का जेबखर्च निकल आयगा.</p>
</p>
<p>यदि अच्छी हालत में हो तो सन 1835 का चांदी का भारतीय रुपया, जिस में मुश्किल से 200 रुपये की चांदी होती है, आजकल 1200 रुपये का बिकता है. उसी तरह से 1880 का तांबे का 1/4 आना आजकल 100 रुपये का बिकता है. ज्ञान का ज्ञान, गुठली का दाम!! [<a href="http://sarathi.info/archives/2116">10 रुपये का सिक्का 100,000 रुपये में !!</a>]</p>
<p align="center"><font size="1"><a title="work at home, free income guide, net income guide, ad words courses, blogging for income, money for blogging, online courses, free course money making" href="http://www.Guide4Income.com">Guide For Income</a> | <a title="abc of, physics made simple, ABC of physics, simplified, guide, made simple, explained, easy articles" href="http://www.Physics4u.info">Physics For You</a> | <a title="articles for your website, free reusable articles, free content, web content, reuse web content, article bank, huge article collection" href="http://www.articlepedia.us">Article Bank</a>&#160; | <a title="free india tourist guide, india tour, Indian tourism, travel guide, free travel information, visit india, taj mahal, indian history, archeology" href="http://www.indiantouristplaces.info">India Tourism</a> | <a title="comprehensive information india, indian history, customs, culture, encyclopedia, festivals, informtion, guide, free articles, free information" href="http://www.india.sarathi.info">All About India</a> | <a title="india, hindi, weblog,  Hindi blog, shastri, hindi articles, creative commons" href="http://www.sarathi.info">Sarathi</a>       <br />Picture: Shastri Philip, You Are Free To Reuse This Picture</font></p>
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		<title>गोरे लुटेरों ने चलाया था इस पैसे को!!</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Mar 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[ईस्ट इंडिया]]></category>

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		<description><![CDATA[ मुझे कई बार हंसी आती है जब लोग कहते हैं कि अंग्रेज शासक आये, इस कारण यह देश इसलिये सभ्य हुआ और हिन्दुस्तान में इस कारण अच्छी शिक्षा व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ. यह वैसी ही बात है कि “अच्छा हुआ कि कल एक राहगीर लुट गया क्योंकि इस कारण अब पुलिस की गश्त तगडी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/eicobv1835.jpg"><img title="EICObv1835" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 50px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="208" alt="EICObv1835" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/eicobv1835-thumb.jpg" width="211" align="left" border="0" /></a> मुझे कई बार हंसी आती है जब लोग कहते हैं कि अंग्रेज शासक आये, इस कारण यह देश इसलिये सभ्य हुआ और हिन्दुस्तान में इस कारण अच्छी शिक्षा व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ. यह वैसी ही बात है कि “अच्छा हुआ कि कल एक राहगीर लुट गया क्योंकि इस कारण अब पुलिस की गश्त तगडी हो गई है”. </p>
<p> <span id="more-23"></span>
</p>
<p>ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी व्यापार करने को, लेकिन जब हिन्दुस्तान की समृद्धि को पास से देखा तो आंखे फट गई. (गरीब के साथ कौन व्यापार करता है). और जब यह देखा कि इस देश के शासकों के बीच फूट है, या फूट डाली जा सकती है तो उनकी बांछे खिल गई कि अब तो आराम से इस देश की हजारों धनी रियासतों को चैन से लूटा जा सकता है. (लोग सिर्फ संपन्न लोगों को लूटते हैं, न कि कंगालों को. यह था हमारा हिन्दुस्तान).</p>
<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/eicobv1835rev.jpg"><img title="EICObv1835Rev" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 50px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="202" alt="EICObv1835Rev" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/eicobv1835rev-thumb.jpg" width="211" align="left" border="0" /></a> किसी भी देश की मुद्रा उसकी सार्वभौमिकता की निशानी है. इस कारण हिन्दुस्तान के हजारों राज्यों के अपने सिक्के थे. लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के लुटेरों ने एक एक करके जब हिन्दुस्तानी रियासतों को अपने हाथ में लिया तो जहां तक हो सका स्थानीय राज्यों के सिक्कों को बंद करवा दिया और “कंपनी” के सिक्के चलाना जरूरी कर दिया. राजनैतिक/सामरिक कमजोरी और फूट के कारण काफी सालों तक हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में गोरे लुटेरों के द्वारा चलाये गये पैसे चलते थे.</p>
<p>इस चित्र में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1835 में उनके द्वारा शासित क्षेत्र में चलाने के लिये ढाले गये सिक्के को आप देख सकते हैं. यह हमारी गुलामी की निशानी है, लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान के इतिहास का भी एक हिस्सा है. यह सिक्का आजकल 50 रुपये से लेकर 250 रुपये तक का बिकता है.</p>
<p>[यदि हम अभी भी न चेते तो कल गुलामी पुन: वापस आ जायगी. आतंकवादी जिस तरह से देश में खुला तांडव कर रहे हैं यह महज इसका एक इशारा मात्र है. पश्चिमी राष्ट्र जिस तरह हमारे संचार माध्यमों का शोषण कर रहे हैं यह भी गुलामी का ही रास्ता बन जायगा.]</p>
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		<title>तीन पैसे के लिये सौ रुपये ठुके!!</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Mar 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[पैसा-कहानियां]]></category>

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		<description><![CDATA[ मेरे कई आलेखों में मैं ने अपने बचपन के पैसों के बारे में बताया था. इस पैसे का उपयोग कई वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने अपने बचपन में किया था.&#160; जब 1964 मे सरकार ने इसे जारी किया तब यह आधा किलो टमाटर खरीदने के लिये पर्याप्त था और जब सस्ता बिकता था तो इतने में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/image.png"><img title="image" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="128" alt="image" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/image-thumb.png" width="120" align="left" border="0" /></a> मेरे कई आलेखों में मैं ने अपने बचपन के पैसों के बारे में बताया था. इस पैसे का उपयोग कई वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने अपने बचपन में किया था.&#160; जब 1964 मे सरकार ने इसे जारी किया तब यह आधा किलो टमाटर खरीदने के लिये पर्याप्त था और जब सस्ता बिकता था तो इतने में एक किलो टमाटर आ जाता था (देखिये, <a href="http://indiancoins.sarathi.info/?p=4">पांच पैसे ने बचाई जान!</a>). लेकिन 1980 के आसपास यह बजार से गायब होने लगा और आज जिनकी उमर 30 साल से कम है उन्होंने इसे शायद ही देखा हो. </p>
<p> <span id="more-17"></span>
<p>आजकल यहां केरल में भिखारी को सामान्यतया इसका लगभग 70&#160; गुना (200 पैसे, या दो रुपये) दिये जाते हैं, तब भी कई भिखारी लोग कुछ और पाने की आस लगाये रहते हैं.</p>
<p>लेकिन पैसों के भी दिन फिरने लगे हैं. इनकी मदद से आप कुछ नहीं खरीद सकते, लेकिन आप इनको खरीदना चाहें तो आप की जेब ढीली हो सकती है. इस इतवार को कोचिन सिक्का सोसाईटी की सभा के बाद चारों तरफ मेज लगाये एक दुकानदार के पास मुझे 3 पैसे और 2 पैसे का एक बंडल नजर आया. लगभग 100 सिक्के होंगे. पूछा तो कीमत बताई 100 रुपये.</p>
<p>यदि मान कर चलें कि सिर्फ तीन पैसे के सिक्के थे, तो कुल मिला कर उनकी क्रय शक्ति हुई 3 रुपये की. लेकिन उनको क्रय करने के लिये मेरे 100 रुपये ठुक गये. मुझे कोई अफसोस नहीं हुआ क्योंकि उन में से अपनी जरूरत के कम से कम 20 से 30 सिक्के निकल आयेंगे. इनको प्रति नग के हिसाब से खरीदता तो 30 सिक्कों के लिये कम से कम 150 रुपये ठुक जाते. लेकिन बंडल में खरीदा तो सिर्फ 100 रुपये खर्च हुए.</p>
<p>इनको साफ करके यदि क्रम से लगा कर वापस बेच दिया जाये तो 80 सिक्को के (20% बेकार निकलते हैं) आराम से 400 रुपये मिल जायेंगे. मतलब यह कि यदि मैं अपने संग्रह के लिये एक सेट बचा लूँ और बाकी अगली सभा में निकाल दूँ तो मेरा सेट मुफ्त का पडेगा. </p>
<p>सौ रुपये ठुक गये, लेकिन सौदा महंगा नहीं पडा. हां, इन सिक्कों को साफ करके लेबल करके बेचने लायक बनाने के लिये लगभग 3 घंटे लगेंगे, जो मुझ जैसे सिक्का-प्रेमी के लिये कठिन नहीं है. तीन पैसे के सिक्कों के लिये सौ रुपये ठुके जरूर, लेकिन आम के आम, गुठली के दाम वाला हिसाब निकला.</p>
<p>यदि आप सिक्कों के शौकीन हों तो क्रमबद्ध तरीके से उनको जमाना शुरू कर दीजिये.</p>
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		</item>
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		<title>पैसे में छेद या छेद वाला पैसा??</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Mar 2009 06:38:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[पैसा-कहानियां]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे पिछले आलेख ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और …. और 2 पैसे की भी कोई कीमत है क्या? में बार बार छेद वाले एक पैसे की चर्चा हुई थी. आज अल्पना जी ने टिपियाया:
(alpana)कृपया छेद वाले सिक्कों के बारे में भी बताईगा..प्रतीक्षा रहेगी.

तो लगा कि इस लेखन परंपरा को समाप्त करने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे पिछले आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/1978">ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और ….</a> और <a href="http://sarathi.info/archives/1982">2 पैसे की भी कोई कीमत है क्या?</a> में बार बार छेद वाले एक पैसे की चर्चा हुई थी. आज अल्पना जी ने टिपियाया:</p>
<blockquote><p>(<cite><a href="http://www.alpana-verma.blogspot.com">alpana</a></cite>)<font color="#0080c0">कृपया छेद वाले सिक्कों के बारे में भी बताईगा..प्रतीक्षा रहेगी.</font></p>
</blockquote>
<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/holepice.jpg"><img title="HolePice" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 5px 0px; border-right-width: 0px" height="232" alt="HolePice" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/holepice-thumb.jpg" width="240" align="left" border="0" /></a>तो लगा कि इस लेखन परंपरा को समाप्त करने के बदले छेद वाले सिक्के की भी चर्चा कर दी जाये. </p>
</p>
<p>दर असल “पैसा” शब्द काफी पहले से उपयोग में आ रहा था, और कई प्रकार के सिक्कों के लिये इसका उपयोग किया गया. अंग्रेजों के राज्य में यह उनके द्वारा चलाया गया आखिरी एक पैसे का सिक्का था. 1943, 44, और 45&#160; के सिक्के बगल में दिखाये गये हैं.&#160; लेकिन देश की आजादी के बाद भी यह सिक्का कुछ साल चला क्योंकि देश में आर्थिक संतुलन बनाये रखने के लिये सरकार नें अंग्रेजों के सिक्के एक दम से बंद नहीं किये. </p>
<p> <span id="more-14"></span>
</p>
<p>हिन्दुस्तान 1947 में आजाद हुआ, लेकिन यह सिक्क लगभग 1958 के आसपास भी चलता था. मुझे याद है 4 से 5 साल की उमर में इसे देकर मैं एक देशी चाकलेट (मूंगफली की चिकी)&#160; खरीदता था. आज इसे आप चला नहीं सकते लेकिन यदि आप खरीदना चाहें तो कम से कम बीस रुपल्ली की चपत लगेगी!! अच्छा सिक्का हो तो 30 रुपये से कम का नहीं पडेगा.</p>
<p>अब एक दिलचस्प बात!! हिन्दी जगत में उमर से वरिष्ठ सभी चिट्ठाकारों ने अपने बचपन में इस सिक्के का उपयोग किया है, लेकिन हम सब के पैदाईश के पहले एक देशी रियासत ने पहला छेद वाला पैसा जारी किया था.</p>
<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/dhabu.jpg"><img title="Dhabu" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="197" alt="Dhabu" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/dhabu-thumb.jpg" width="210" align="left" border="0" /></a> गुजरात के कच्छ इलाके के शासक काफी बुद्धिमान, सुलझे, एवं शक्तिशाली लोग थे. इन लोगों ने मुगलों तक को नाको तले चने चबवा दिये थे. इस कारण इनको शासन की पूरी आजादी दी गई थी. अंग्रेजों ने भी इनके साथ यही किया. </p>
<p>कच्छ के शासकों ने आधुनिक सिक्का-शास्त्र को सोचसमझ कर इस तरह से प्रभावित किया कि यह भारत के स्वाभिमान के लिये स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा. इन शासकों में से महाराव श्री विजयराज जी ने तांबे का छेद वाला एक सिक्का चलाया था जिसे ढबू नाम दिया गया था. बगल में शक संवत 1999 (ईस्वी 1942) में जारी किये गये ढबू का चित्र देख सकते हैं. त्रिशूल और कटार भी दिख रहा है. भारत की आजादी के समय तक कच्छ के शासक अपने चांदी और तांबे के सिक्के छाती ठोक कर चलाते रहे! बस विदेशी शासकों का नाम भर सिक्के के पीछे लिख देते थे.</p>
<p>कच्छ के तांबे के सिक्के अब दुर्लभ होते जा रहे हैं और ऊपर दिखाया सिक्का आजकल कम से कम 350 रुपये का पडता है, और सिक्का-बाजार में बहुत कम दिखता है.</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>2 पैसे की भी कोई कीमत है क्या?</title>
		<link>http://indiancoins.sarathi.info/?p=9</link>
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		<pubDate>Mon, 16 Mar 2009 05:29:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[ मेरे कल के आलेख ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और …. में मैं ने 2 आने का एक सिक्का दिखाया था जो हमारे बचपन में एक बहुत बडी राशि होती थी.&#160; इस पर समीर जी ने टिपियाया कि “दो आने की बात करने को करोड़ों के नाम शीर्षक में??”.
समीर जी की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/2paise.jpg"><img title="2Paise" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 20px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="220" alt="2Paise" src="http://indiancoins.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/03/2paise-thumb.jpg" width="240" align="left" border="0" /></a> मेरे कल के आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/1978">ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और ….</a> में मैं ने 2 आने का एक सिक्का दिखाया था जो हमारे बचपन में एक बहुत बडी राशि होती थी.&#160; इस पर समीर जी ने टिपियाया कि “दो आने की बात करने को करोड़ों के नाम शीर्षक में??”.</p>
<p>समीर जी की टिप्पणी पढ मुझ एकदम अपनी गलती का बोध हुआ कि करोडों के चक्कर में अरबों का एक नाम तो रह गया &#8211;&#160; समीर जी का!! अब टिप्पणी में उन्होंने कहा या नहीं, लेकिन आज के चित्र में जो 2 नये पैसे दिख रहे हैं इस प्रकार के सिक्के सहित 2 आने का उपयोग उन्होंने भी किया था!! </p>
<p> <span id="more-9"></span>
</p>
<p>इस बीच <cite><a href="http://c2amar.blogspot.com">डा. अमर कुमार</a></cite> ने एक गजब की टिप्पणी दी: “<em>शास्त्री जी ने लोगों की उम्र अंदाज़ने का यह अनोखा शस्त्र तैयार किया है..साथियों को दुअन्नी दिखा कर उम्र कबूलवाने की…”</em> . प्रिय डाक्टर,&#160; मुझे एकदम लगा कि काश जिंदगी में हर चीज इतनी आसान होती तो मजा आ जाता!!</p>
<p>ऊपर के दो सिक्के जब ढाले गये थे तब मैं “देशी” किंटरगार्डन में पढ रहा था. केरल में इस तरह के गुरुकुल तब आम थे. यहां टाटपट्टी पर बैठ कर सामने बिछी महीन बजरी पर ऊंगलियों से लिख कर अक्षराभ्यास करते थे. अक्षर ताड पत्रों पर लिखे जाते थे और हम उन “पाठ्यपुस्तकों” को लेकर गुरुकुल जाते थे. इन गुरुकुलों को व्यक्तिगत स्तर पर चलाया जाता था और इनको किसी तरह की सरकारी मान्यता या अनुदान नहीं दिया जाता था. पांच साल की उमर पूरी होने पर ही मान्यता प्राप्त विद्यालय की पहली कक्षा में प्रवेश मिलता था.</p>
<p>रुपये के&#160; सौवें भाग&#160; (एक पैसे) की कीमत इतनी होती थी कि बस में हमारा कंडक्टर रोज एक पैसा “मार” लेता था. पांच पैसे का टिकट होता था,&#160; और छ: पैसे की इकन्नी देने पर वह एक पैसा देना अकसर “भूल” जाता था. यह इतनी बडी राशि थी कि एक बार मेरे एक मित्र के पिताजी ने कंडक्टर के हाथपैर तोडने की धमकी दे डाली थी. फल यह हुआ कि हम सब को बचा एक पैसा बिना पूछे ही वापस मिलने लगा.</p>
<p>आज स्थिति यह है कि दोसौ पैसे (दो रुपया) भिखारी को देते हैं तो वह पूछता है कि इसका “क्या” होगा. पिछले महीने तो मैं ने एकदम पैसा वापस लेने के लिये हाथ बढा दिया, तब उसे समझ में आया कि बंधा बंधाया “दाता” नाराज हो गया है. कल शायद&#160; स्थिति ऐसी आयगी कि दस का नोट बढा दें तो भिखारी कहेगा कि “यह अपने @#%@&amp;* को ले जा कर दे देना. हमें क्या भिखारी समझ रखा है कि दस का नोट बढा रहे हो”.</p>
<p>लेकिन कौन कहता है कि पैसे की कीमत नहीं है. आज सिक्का संग्रह करने वाले ऊपर दिखाये गये सिक्के को पांच से दस रुपया प्रति सिक्का खरीदते हैं.</p>
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		<title>लुप्त होती सिक्का-संपदा !</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Mar 2009 18:10:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[ 
चित्र: अंग्रेजों के जमाने के एक प्रकार के दो भारतीय सिक्के, एक जिस हालत में मुझे ये सिक्के मिले उसको दिखाता है एवं दूसरा चित्र सिक्के की वैज्ञानिक विधि से सफाई करने के बाद का चित्र है. इस विषय पर मेरी पुस्तक 3 से 4 महीने में छपने वाली है.
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मेरे पिछले लेख क्या ऐसा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/10/bicoins.jpg"><font size="2"><img title="BI Coins" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 0px 0px 20px; border-right-width: 0px" height="211" alt="BI Coins" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/10/bicoins-thumb.jpg" width="400" border="0" /></font></a><font size="2"> </font></p>
<p><font color="#0000ff" size="2">चित्र: अंग्रेजों के जमाने के एक प्रकार के दो भारतीय सिक्के, एक जिस हालत में मुझे ये सिक्के मिले उसको दिखाता है एवं दूसरा चित्र सिक्के की वैज्ञानिक विधि से सफाई करने के बाद का चित्र है. इस विषय पर मेरी पुस्तक 3 से 4 महीने में छपने वाली है.</font></p>
<p><font size="2">&#160;</font></p>
<p><font size="2">मेरे पिछले लेख </font><a href="http://sarathi.info/archives/1546"><font size="2">क्या ऐसा इतिहास कहीं और मिलेगा? </font></a><font size="2">में मैं ने हिन्दुस्तान की असाधारण पृष्ठभूमि का जिक्र किया था. हीनभावना से ग्रस्त हिन्दुस्तानियों के अलावा हर कोई यह जानतामानता है कि हिन्दुस्तान दुनियां के सबसे श्रेष्ठ देशों में से एक है एवं हमारी प्राचीन विरासत तो श्रेष्ठतम है. </font></p>
<p> <span id="more-6"></span>
<p><font size="2"></font></p>
<p><font size="2">जो भारतीय हिन्दुस्तान की महानता को नहीं जानते वे हमेशा ही इस देश की संस्कृति, तकनीकी, एवं कलाओं को विदेशियों के हाथ बेचते रहे हैं. भारत के करोडों रुपये के हीरे जवाहरात, लाखों विरल मूर्तियां, एवं लाखों हस्तलिकित पांडूलिपियां आज विदेशियों के हाथ हैं. अफसोस यह है कि इस तरह की बिक्री आज भी चल रही हैं.</font></p>
<p><font size="2">नियम के अनुसार 100 साल से अधिक पुरानी चीजें देश के बाहर नहीं ले जाई सकतीं. लेकिन जिन स्थानों में विदेशी पर्यटक खूब आते हैं वहां इस तरह के चीजों की बिक्री जम कर होती है. इन चीजों में से इन दिनों मेरा ध्यान सबसे अधिक भारतीय सिक्कों पर है.&#160; ये इतने छोटे होते हैं कि बडे आराम से कोई भी व्यक्ति इनको अपने सामान में छुपा कर विदेश ले जा सकता है, एवं ऐसा ही हो रहा है. इतना ही नहीं, कई व्यापारी लोग धडल्ले से डाक द्वारा सिक्कों के गट्ठर विदेशियों को बेच रहे है.</font></p>
<p><font size="2"></font></p>
<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/10/silver.jpg"><font size="2"><img title="Silver" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 0px 0px 20px; border-right-width: 0px" height="250" alt="Silver" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/10/silver-thumb.jpg" width="400" border="0" /></font></a><font size="2"> </font></p>
<p><font color="#0000ff" size="2">चित्र: चांदी के कुछ पुरातन सिक्के. पहले चार सिक्कों की सफाई नहीं हुई है एवं अंतिम दो की सफाई हो चुकी है. पांचवे सिक्के पर सूर्यदेवता का चित्र देखें. यह वीर रानी अहिल्याबाई द्वारा चलाया गया सिक्का है.</font></p>
<p><font size="2">&#160;</font></p>
<p><font size="2">इसका फल यह है कि कई दुर्लभ हिन्दुस्तानी सिक्के आज सिर्फ विदेशी सिक्का-विक्रेताओं के पास हैं. उदाहरण के लिये “कांगडा” राज्य के सिक्के फिलहाल किसी भी भारतीय सिक्का-विक्रेता के पास नहीं है जबकि एक विदेशी सिक्का-विक्रेता के पास सैकडों कांगडा सिक्के बिक्री के लिये पहुंच चुके हैं. </font></p>
<p><font size="2">यदि आपके पास यदि किसी भी तरह के प्राचीन भारतीय सिक्के हैं तो उनको विदेशी हाथों में पडने से बचायें. या तो उसे सुरक्षित रखें, या किसी भारतीय सिक्का-शास्त्री को या ऐसे शौकीन को दे दें या बेच दें जो उसकी कदर करेगा. या किसी ऐसे व्यक्तिगत संग्रहालय को दे दें जो लोगों को उसे देखने एवं अध्ययन करने का मौका देगा. (फिलहाल कई सरकारी संग्रहालय सिक्का-शास्त्रियों को अपने सिक्कों का अध्ययन करने की सुविधा नहीं देते एवं छायाचित्र लेना निषिद्ध कर रखा है).</font></p>
<p><font size="2">[यदि किसी पाठक के पास प्राचीन सिक्के हों तो छायाचित्र लेने का एक मौका जरूर मुझे दें जिससे कि दुर्लब सिक्कों की याद के लिये उनको मेरे द्वारा बनाये जा रहे डाटाबेस में जोडा जा सके]. </font></p>
<p><font size="2"></font></p>
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<p><font size="2"></font></p>
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		<title>पांच पैसे ने बचाई जान!</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Mar 2009 18:06:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[पैसा-कहानियां]]></category>

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		<description><![CDATA[ सन 1961 की बात है ग्वालियर में बहुत सुविधाजनक सरकारी सिटीबस सेवा उपलब्ध थी और अधिकतर विद्यार्थी रियायती मासिक-पास पर यात्रा करते थे. लेकिन&#160; एक दिन हम तीन मित्रों ने बस छोड कर विद्यालय से घर पैदल जाना तय किया.&#160; 
पाच किलोमीटर की दूरी, ग्वालियर की कडी गर्मी. आधे रास्ते सब पस्त हो गये. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/12/tomato.jpg"><img title="Tomato" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="239" alt="Tomato" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/12/tomato-thumb.jpg" width="240" align="left" border="0" /></a> <font face="Mangal" size="2">सन 1961 की बात है ग्वालियर में बहुत सुविधाजनक सरकारी सिटीबस सेवा उपलब्ध थी और अधिकतर विद्यार्थी रियायती मासिक-पास पर यात्रा करते थे. लेकिन&#160; एक दिन हम तीन मित्रों ने बस छोड कर विद्यालय से घर पैदल जाना तय किया.&#160; </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">पाच किलोमीटर की दूरी, ग्वालियर की कडी गर्मी. आधे रास्ते सब पस्त हो गये. अब आगे बस से जाना संभव नहीं था क्योंकि हम&#160; मूल रास्ते को छोड बिन-बस के रास्ते पर थे. प्यासों के लिये शहर भर में प्याऊ लगे थे और एकदम ठंडा पानी मिल जाता था, लेकिन कुछ देर में भूख के मारे हालत खराब हो गई.</font></p>
<p> <span id="more-4"></span>
<p><font face="Mangal" size="2"></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">रास्ते में किसी का कोई रिश्तेदार न था. न ही मांबाप को फोन पर बुलाया जा सकता </font><font face="Mangal" size="2">था. एसटीडी पीसीओ का जमाना तो उसके तीस साल बाद आया था. वैसे भी उस समय फोन या तो तारघर में, सरकारी दफ्तरों में, या नगरसेठ के घर में ही दिखते थे तो घर पर क्या फोन करते.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">अचानक बगल के खेत से निकल कर टमाटर से भरा एक ठेला आता दिखा. ठेलेवाला आवाज लगा रहा था &quot;पांच पैसे का एक किलो ले लो&quot;. अचानक मुझे याद आया कि आपात स्थिति के लिये मां ने पापा की जानकारी के बिना मुझे जो &quot;पांच&quot; पैसे दिये थे वह अभी भी बस्ते के सीक्रेट पाकेट मैं है. बस फिर क्या था, एक किलो टमाटर खरीदा और जम के खाया. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ठेलेवाला खेत से टमाटर लेके निकला ही था कि हम लोगों ने पांच पैसे जैसी बडी राशि देकर बिना मोलभाव बोहनी की अत: उसने दोचार टमाटर अतिरिक्त दे दिया था. तीनों ने जम कर खाया, मां और ठेलेवाले को दुआएं दीं,&#160; और खेत के कूएं पर जाकर जम कर पानी पीकर तरोताजा हुए. उसके बाद अगले ढाई किलोमीटर कैसे बीते यह पता भी नहीं चला. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हां एक चीज जरूर याद है, उस दिन टमाटर का जो स्वाद आया था वह न तो उसके पहले न उसके बाद कभी आया!!! न ही 1965 के बाद कभी इस भाव पर टमाटर दिखे! </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">[</font><a href="http://rampuriapc.blogspot.com" target="_blank"><font face="Mangal" size="2">ताऊ रामपुरिया</font></a><font face="Mangal" size="2">] शास्त्री जी एक बात तो आपने सिद्ध करदी की आपके परेंट्स भी मालदार थे ! जो आपको पाँच पैसे जेब खर्च में देते थे ! हमको बड़े रोने&#160; धोने के बाद एक पैसा डबली मिलता था ! और उस में गुड और मूंगफली दोनों खरीद कर खा लेते थे! यही मेवा था उस समय का ! </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">पैसा एक छोटा , जिसे पाला या छोटा पैसा यानि छ. पैसे का एक आना ! और दुसरे डबली या छेद वाला पैसा यानी ४ पैसे का एक आना होता था ! और&#160; ये ताम्बे के सिक्के हुआ करते थे ! </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हमारी दादीजी जो अपनी दीवार की अलमारी में अपना खजाना ( कुछ कागज़ के और चांदी के सिक्के और कुछ ये ताम्बे के सिक्के ) एक कटोरे में&#160;&#160; रखती थी ! हमारे से दो तीन क्लास सीनियर&#160; सहपाठी के कहने से उसमे से एक रुपये के&#160; नोट पर हाथ साफ़ कर दिया !      <br />नोट लेजाकर&#160; हमारे सीनियर सहपाठी को देदिया ! यकीन कीजिये उस नोट को खुला करवाने में पसीना आगया ! किसी तरह चोरी छिपे पास के गाँव में दो&#160; पैसे की मूंगफली और बताशे लिए ! जो दोनों से खाए नही गए ! फ़िर&#160; उस दुकानदार ने साढे पन्द्रह आने खुल्ले दिए उनको कहां रखे ? बड़ी मुश्किल हुई ! किसी तरह गाँव के बाहर जमीन में उन बाक़ी पैसो को दबा&#160; कर घर आए ! </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कुल जमा उस खजाने को खोद खोद कर&#160; दो आने खर्च कर पाये की पुरे गाँव में ढिंढोरा पिट गया की ये रोज मूंगफली बताशे खाते हैं ! बस क्या था ? पकड़े&#160; गए ! </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">घर लाकर हमारी माताजी ने खूब ठोका बजाया, क्योंकि पिताजी बाहर गए थे !&#160; और आयन्दा चोरी करने की कसम खिलवायी गांधीजी की तरह !      <br />बस वो आखिरी चोरी थी घर में ! सरकारी टेक्स वेक्स की चोरी तो चलती रहती है ! उसके लिए माताजी ने कसम नही दिलाई थी ! शायद गाँव की महिला थी उसको क्या मालूम था की उसका सपूत आगे जाकर इस लायक हो जायेगा की इसे सरकारी टेक्स की चोरी भी राजी या बेराजी करनी पड़ेगी ! नही तो वो उसकी भी कसम दिलवा चुकी होती तो क्या होता ?</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">वैसे बहुत सही याद दिलाया ! उस जमाने में नगद रुपया नही था ! हमारे गाँव में एक ताऊ थे जो कहा करते थे की नोट फुडवा ( खुल्ला) लिया की किस्मत फुड्वाली ! बहुत अच्छे किस्से याद दिलवाए जारहे हो आप तो ! लगता है सब&#160; कन्फेशन आप अपने ब्लॉग पर करवा लोगे हमसे तो ! <img src='http://indiancoins.sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </font></p>
<p>&#160;</p>
<p>&#160;</p>
<p>[Picture Credit: <small><b><a href="http://flickr.com/photos/werms/">jacki-dee</a>, Creative Commons]</b></small></p>
<p><small></small></p>
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<p align="center"><a href="http://www.articlepedia.us"><font size="1">Article Bank</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://guide4income.com"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://allthingsindian.org"><font size="1">About India</font></a><font size="1"> । </font><a href="http://www.CoinsEncyclopedia.org"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.physics4u.info"><font size="1">Physics Made Simple</font></a></p>
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