मेरे कल के आलेख ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और …. में मैं ने 2 आने का एक सिक्का दिखाया था जो हमारे बचपन में एक बहुत बडी राशि होती थी. इस पर समीर जी ने टिपियाया कि “दो आने की बात करने को करोड़ों के नाम शीर्षक में??”.
समीर जी की टिप्पणी पढ मुझ एकदम अपनी गलती का बोध हुआ कि करोडों के चक्कर में अरबों का एक नाम तो रह गया – समीर जी का!! अब टिप्पणी में उन्होंने कहा या नहीं, लेकिन आज के चित्र में जो 2 नये पैसे दिख रहे हैं इस प्रकार के सिक्के सहित 2 आने का उपयोग उन्होंने भी किया था!!
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चित्र: अंग्रेजों के जमाने के एक प्रकार के दो भारतीय सिक्के, एक जिस हालत में मुझे ये सिक्के मिले उसको दिखाता है एवं दूसरा चित्र सिक्के की वैज्ञानिक विधि से सफाई करने के बाद का चित्र है. इस विषय पर मेरी पुस्तक 3 से 4 महीने में छपने वाली है.
मेरे पिछले लेख क्या ऐसा इतिहास कहीं और मिलेगा? में मैं ने हिन्दुस्तान की असाधारण पृष्ठभूमि का जिक्र किया था. हीनभावना से ग्रस्त हिन्दुस्तानियों के अलावा हर कोई यह जानतामानता है कि हिन्दुस्तान दुनियां के सबसे श्रेष्ठ देशों में से एक है एवं हमारी प्राचीन विरासत तो श्रेष्ठतम है.
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