मेरे कई आलेखों में मैं ने अपने बचपन के पैसों के बारे में बताया था. इस पैसे का उपयोग कई वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने अपने बचपन में किया था. जब 1964 मे सरकार ने इसे जारी किया तब यह आधा किलो टमाटर खरीदने के लिये पर्याप्त था और जब सस्ता बिकता था तो इतने में एक किलो टमाटर आ जाता था (देखिये, पांच पैसे ने बचाई जान!). लेकिन 1980 के आसपास यह बजार से गायब होने लगा और आज जिनकी उमर 30 साल से कम है उन्होंने इसे शायद ही देखा हो.
मेरे पिछले आलेख ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और …. और 2 पैसे की भी कोई कीमत है क्या? में बार बार छेद वाले एक पैसे की चर्चा हुई थी. आज अल्पना जी ने टिपियाया:
(alpana)कृपया छेद वाले सिक्कों के बारे में भी बताईगा..प्रतीक्षा रहेगी.
तो लगा कि इस लेखन परंपरा को समाप्त करने के बदले छेद वाले सिक्के की भी चर्चा कर दी जाये.
दर असल “पैसा” शब्द काफी पहले से उपयोग में आ रहा था, और कई प्रकार के सिक्कों के लिये इसका उपयोग किया गया. अंग्रेजों के राज्य में यह उनके द्वारा चलाया गया आखिरी एक पैसे का सिक्का था. 1943, 44, और 45 के सिक्के बगल में दिखाये गये हैं. लेकिन देश की आजादी के बाद भी यह सिक्का कुछ साल चला क्योंकि देश में आर्थिक संतुलन बनाये रखने के लिये सरकार नें अंग्रेजों के सिक्के एक दम से बंद नहीं किये.
सन 1961 की बात है ग्वालियर में बहुत सुविधाजनक सरकारी सिटीबस सेवा उपलब्ध थी और अधिकतर विद्यार्थी रियायती मासिक-पास पर यात्रा करते थे. लेकिन एक दिन हम तीन मित्रों ने बस छोड कर विद्यालय से घर पैदल जाना तय किया.
पाच किलोमीटर की दूरी, ग्वालियर की कडी गर्मी. आधे रास्ते सब पस्त हो गये. अब आगे बस से जाना संभव नहीं था क्योंकि हम मूल रास्ते को छोड बिन-बस के रास्ते पर थे. प्यासों के लिये शहर भर में प्याऊ लगे थे और एकदम ठंडा पानी मिल जाता था, लेकिन कुछ देर में भूख के मारे हालत खराब हो गई.


