भारतीय सिक्के अकसर मिश्र धातुओं के बनते हैं, लेकिन सन 2005 में पहली बार द्विधातु के 10 रुपये के सिक्के जारी किये गये जिनको शायद ही किसी ने देखा हो!! जितने सिक्के जारी किये गये थे वे सब के सब सिक्का-प्रेमी लोगों ने सीधे सरकार से खरीद लिये थे, और बाद में सन 2005 का द्विधातु का 10 रुपये का एक सिक्का 1 लाख रुपये तक में बिका था.
2005 का यह सिक्का इतना दुर्लभ है कि मैं ने अभी तक इसके दर्शन नहीं किये है. इसके बाद 2006 और 2007 में इसी तरह के द्विधातु के 10 रुपये के सिक्के जारी किये गये, लेकिन वे भी संग्रहकर्ताओं ने खरीद लिये और बाजार में नहीं उतर पाये. 2006 का एक सिक्का तब 5000 रुपये में बिकता था, लेकिन अब कीमत कुछ कम हो गई है.
बगल में 2006 का जो सिक्का दिख रहा है वह आजकल 500 रुपये का हो गया है. सन 2007 का सिक्का भी आजकल 500 रुपये का बिकता है. सरकार 2008 में पुन: इस तरह के सिक्के जारी करने जा रही है जिसे आप बगल में देख सकते हैं.
इस बार सरकार इन सिक्कों की संग्रहकर्ता-मांग से लगभग दुगने सिक्के जारी करने जा रही है और इस कारण ये महज 50 रुपये में बिक रहे हैं. लेकिन जरा सोचें कि सन 2008 का 10 रुपये का सिक्का यदि आज 50 रुपये में बिक रहा हो तो इस द्विधातुअ सिक्के का भविष्य कैसा होगा.
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मुझे कई बार हंसी आती है जब लोग कहते हैं कि अंग्रेज शासक आये, इस कारण यह देश इसलिये सभ्य हुआ और हिन्दुस्तान में इस कारण अच्छी शिक्षा व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ. यह वैसी ही बात है कि “अच्छा हुआ कि कल एक राहगीर लुट गया क्योंकि इस कारण अब पुलिस की गश्त तगडी हो गई है”.
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मेरे कई आलेखों में मैं ने अपने बचपन के पैसों के बारे में बताया था. इस पैसे का उपयोग कई वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने अपने बचपन में किया था. जब 1964 मे सरकार ने इसे जारी किया तब यह आधा किलो टमाटर खरीदने के लिये पर्याप्त था और जब सस्ता बिकता था तो इतने में एक किलो टमाटर आ जाता था (देखिये, पांच पैसे ने बचाई जान!). लेकिन 1980 के आसपास यह बजार से गायब होने लगा और आज जिनकी उमर 30 साल से कम है उन्होंने इसे शायद ही देखा हो.
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मेरे पिछले आलेख ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और …. और 2 पैसे की भी कोई कीमत है क्या? में बार बार छेद वाले एक पैसे की चर्चा हुई थी. आज अल्पना जी ने टिपियाया:
(alpana)कृपया छेद वाले सिक्कों के बारे में भी बताईगा..प्रतीक्षा रहेगी.
तो लगा कि इस लेखन परंपरा को समाप्त करने के बदले छेद वाले सिक्के की भी चर्चा कर दी जाये.
दर असल “पैसा” शब्द काफी पहले से उपयोग में आ रहा था, और कई प्रकार के सिक्कों के लिये इसका उपयोग किया गया. अंग्रेजों के राज्य में यह उनके द्वारा चलाया गया आखिरी एक पैसे का सिक्का था. 1943, 44, और 45 के सिक्के बगल में दिखाये गये हैं. लेकिन देश की आजादी के बाद भी यह सिक्का कुछ साल चला क्योंकि देश में आर्थिक संतुलन बनाये रखने के लिये सरकार नें अंग्रेजों के सिक्के एक दम से बंद नहीं किये.
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